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महिलाओं पर अत्याचारों के प्रति हमारी संवेदनाओं का धीरे धीरे खत्म होना चिंता का विषय है

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महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर दिनोंदिन हम सबकी संवेदनाएं कम होते होते खत्म हो रही हैं। दरअसल इस बात का हमें एहसास ही नहीं है कि हम इन घटनाओं को कितनी सहजता से लेने लगे हैं। क्या हम सिर्फ सोशल मीडिया पर किसी घटना का विरोध करके ही अपने कर्तव्यों से कन्नी काटने में माहिर होने लगे हैं? जिस औरत को देवी मानकर पूजा जाता हो ,  उस औरत को वस्त्रहीन करके सड़क पर खुलेआम घुमाया जाना क्या हमारी संवेदनाओं  के अंत होने की निशानी नहीं है। मां या बहन की तरफ आंख उठाने पर आंख नोच लेने का दावा करने वाला यह समाज उस समय कहां था जब बिहार के भोजपुर जिले में एक महिला को सड़कों पर खुलेआम उसके कपड़े उतरवाकर घुमाया जा रहा था। ऐंसा करने के पीछे कारण था एक सनकी भीड़ का यह शक कि वह महिला एक युवक की हत्या में शामिल है। क्या इस देश में अब भीड़ के शक के आधार पर ही फैसले होंगे? अगर भीड़ को ही फैसले करना है तो फिर इस पुलिस, अदालत, कानून और लोकतंत्र का ढोंग क्यों किया जा रहा है। बलात्कारियों के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में फांसी-फांसी चिल्लाने वाले लोगों में से क्या कोई भी उस वक़्त भोजपुर में नहीं था जो उस महिल...

सिर्फ नेता ही नहीं, देश की जनता भी जुमलेबाज़ है।

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सिर्फ  नेता ही नहीं, हमारे देश की जनता भी जुमलेबाज़ है। हमें कोई हक नहीं किसी नेता को जुमलेबाज़ कहकर कोसने का। "हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई  आपस में हैं भाई भाई", यह जुमला सालों से बोलकर हम सभी धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करते आये हैं । लगातार हो रही धर्म, मज़हब, जाती के नाम पर हत्याएं हमारे झूठे सेकुलरिज्म पर जोरदार तमाचा जड़ती हैं । दिल्ली में अंकित नाम के युवक की सिर्फ इस कारण हत्या हो जाना की उसने एक दूसरे मज़हब की लड़की से प्यार किया था एक बहुत ही डरावनी घटना है, यह घटना हमें आगाह कर रही है एक ऐंसे समाज को बनने से रोकने के लिए जहां एक हिन्दू एक मुसलमान के मोहल्ले में रहने से पहले डरेगा, जहां एक मुसलमान हिन्दू लड़की से बात करने से पहले सोचेगा की कहीं ऐंसा न हो कि उस लड़की के मज़हब वाले उसे  देख लें और उसकी हत्या हो जाए। इस बात पर कोई दो राय नहीं है कि हमारे समाज में कई ऐंसे लोग विराजमान हैं जो ऐंसे समाज को बनाने की कोशिश कर रहे हैं, अगर यही स्थिति रही तो वो दिन भी दूर नहीं जब नेता इस बात पर वोट मांगेगा की हम हिंदुओं को मुसलमानों के हाथों मरने से बचाएंगे, ओर अगला नेता यह कहेगा कि ह...

घृणा दूसरे धर्म की कुप्रथा से है या दूसरे धर्म से?

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ईद ओर दीवाली दो ऐंसे त्योहार हैं जो हिंदुस्तान में किसी एक धर्म की जागीर नही रह गए हैं बल्कि अब यह त्योहार हमारे देश की संस्कृति का हिस्सा हैं । इन त्योहारों से भारत का हर व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है मीठी ईद में सेवइयों का इंतज़ार ओर बकरीद में मटन का इंतज़ार मुसलमानों से ज़्यादा अन्य धर्म के लोगो को करते हुए  देखा है मेने , यही तो एक खास बात है  जिसके कारण आज भी हम अनेक होकर भी एक हैं  । अब बात करते हैं कुर्बानी की ... भारत एक हिन्दू बहुसंख्यक देश है ,हिंदुओं की कुछ जातियों ,कुछ मान्यताओं में मांस का सेवन पाप माना गया है पर यदि वर्तमान की बात की जाए तो कई हिंदुओं ने मांस का सेवन करना शुरू कर दिया है यहां तक कि कई ऐंसी जाती के लोगों ने भी जिनका हिन्दू धर्म में एक ऊंचा स्तर है उदाहरण के तौर पर ब्राह्मण ( जातियों का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि वर्तमान में भी जाति व्यवस्था खत्म नही हुई है , कृपया यह न समझें कि में जातिवाद का समर्थक हूँ) ओर भी कई ऐंसी जाती के लोगों ने मांस खाना शुरू किया है जहाँ मांस पूरी तरहां प्रतिबंधित था । जब अधिकतम हिंदुओं ने मा...

कैलाश सत्यार्थी ने पत्रकारिता विद्यार्थियों से साझा किए अनुभव

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का सत्रारम्भ कार्यक्रम दिनांक 27,28 एवं 29 जुलाई को आयोजित हुआ । विभिन्न क्षेत्रों के सफल व्यक्तियों ने आयोजन में आकर अपने वक्तव्य से सभी विद्यार्थियों को अपने सम्बन्धित क्षेत्र में सफलता हासिल करने के  गुण सिखाये एवं उत्साहवर्धन किया। आयोजन के पहले दिन पहला वक्तव्य नोबेल पुरस्कार विजेता श्री कैलाश सत्यार्थी जी का था । अपने वक्तव्य में कैलाश सत्यार्थी जी ने अपने जीवन के निजी अनुभव विद्यार्थियों से साझा किए ,उन्होंने बताया कि किस प्रकार समाज सेवा की ओर रुझान के चलते उन्होंने इंजीनियरिंग कॉलेज की नोकरी छोड़ी ओर संघर्ष जारी रहेगा नामक पत्रिका का प्रकाशन किया जिसमें समाज के संपन्न तबके के लिए कोई जगह नही थी इस पत्रिका में सिर्फ समाज के पीड़ित वर्ग को ही जगह मिलती थी ,संसाधनों और धन की कमी के चलते  पत्रिका के संपादक से लेकर लेखक,प्रूफ रीडर ओर यहां तक कि वितरण करने का कार्य भी स्वयं ही किया।अपनी पत्रिका मैं  लोगों की कहानी लिखते लिखते वह कब स्वयं भी उनकी मदद के लिए जाने लगे उन्हें खुद भी पता नही चला ।  नोबेल पु...

धार्मिक प्रथा कहां तक सफल?

औरत तो सदियों से अपने बाल ओर चेहरा छुपाती आई है क्या मिला उसको ? क्या ओरत की इज़्ज़त करना  आ गया लोगों को इस्लाम में लगभग 1400 साल से पर्दा कर रही है औरत, तथाकथित सनातन धर्म भी सदियों ...

यही है भष्टाचार मुक्त सरकार?

हाई कोर्ट द्वारा भी अयोग्य घोषित किये जाने पर नरोत्तम मिश्रा जी अभी तक पद पर बने हुए हैं क्या मुख्यमंत्री जी उनसे इस्तीफा मांगने का साहस नही जुटा पा रहे? या फिर यह सब एक ही हम...

देश या धर्म?

उम्मीद करता हूँ आप मुझसे सहमत होंगे । हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कई समस्याएं हमारे सामने आती हैं। आमतौर पर हर समस्या के लिए हम देश को ही जिम्मेदार ठहराते हैं  जैसे नोकरी न मिलना,सही कानून व्यवस्था का न होना ,महिलाओं पर अत्याचार होना,सैनिकों का शहीद होने  इन सब के लिए या तो हम सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं या देश को ओर ऐंसा करना गलत भी नही है जिस देश में हम रह रहे हैं हमारी उम्मीद होती हैं उस देश से वेसे ही जैसे एक संतान की अपने माता - पिता से । जब हम हर समस्या के लिए देश से उम्मीद रखते हैं तो क्या हमारा फ़र्ज़ नही है कि देश को सबसे ज़्यादा तवज्जो दी जाए । हम में से अधिकतम लोगों के लिए देश से ज़्यादा महत्वपूर्ण धर्म है , ऐंसे लोगों से प्रश्न है मेरा: अगर धर्म सब कुछ है तो खराब सड़क के लिए अपने धर्म को जिम्मेदार क्यों नही मानते, महिलाओं पर जब अत्याचार होता है तो क्यों अपने परमात्मा को दोष नही देते क्योंकि परमात्मा ने ही तो बलात्कारियों को बुद्धि दी है ना।  अब आप में से कुछ लोग कहेंगे या सोचेंगे कि धर्म अपनी जगह है और देश अपनी जगह  उनके लिए एक ओर प्रश्न है कुछ हिंदुओं द्...