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Showing posts from 2017

घृणा दूसरे धर्म की कुप्रथा से है या दूसरे धर्म से?

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ईद ओर दीवाली दो ऐंसे त्योहार हैं जो हिंदुस्तान में किसी एक धर्म की जागीर नही रह गए हैं बल्कि अब यह त्योहार हमारे देश की संस्कृति का हिस्सा हैं । इन त्योहारों से भारत का हर व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है मीठी ईद में सेवइयों का इंतज़ार ओर बकरीद में मटन का इंतज़ार मुसलमानों से ज़्यादा अन्य धर्म के लोगो को करते हुए  देखा है मेने , यही तो एक खास बात है  जिसके कारण आज भी हम अनेक होकर भी एक हैं  । अब बात करते हैं कुर्बानी की ... भारत एक हिन्दू बहुसंख्यक देश है ,हिंदुओं की कुछ जातियों ,कुछ मान्यताओं में मांस का सेवन पाप माना गया है पर यदि वर्तमान की बात की जाए तो कई हिंदुओं ने मांस का सेवन करना शुरू कर दिया है यहां तक कि कई ऐंसी जाती के लोगों ने भी जिनका हिन्दू धर्म में एक ऊंचा स्तर है उदाहरण के तौर पर ब्राह्मण ( जातियों का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि वर्तमान में भी जाति व्यवस्था खत्म नही हुई है , कृपया यह न समझें कि में जातिवाद का समर्थक हूँ) ओर भी कई ऐंसी जाती के लोगों ने मांस खाना शुरू किया है जहाँ मांस पूरी तरहां प्रतिबंधित था । जब अधिकतम हिंदुओं ने मा...

कैलाश सत्यार्थी ने पत्रकारिता विद्यार्थियों से साझा किए अनुभव

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय का सत्रारम्भ कार्यक्रम दिनांक 27,28 एवं 29 जुलाई को आयोजित हुआ । विभिन्न क्षेत्रों के सफल व्यक्तियों ने आयोजन में आकर अपने वक्तव्य से सभी विद्यार्थियों को अपने सम्बन्धित क्षेत्र में सफलता हासिल करने के  गुण सिखाये एवं उत्साहवर्धन किया। आयोजन के पहले दिन पहला वक्तव्य नोबेल पुरस्कार विजेता श्री कैलाश सत्यार्थी जी का था । अपने वक्तव्य में कैलाश सत्यार्थी जी ने अपने जीवन के निजी अनुभव विद्यार्थियों से साझा किए ,उन्होंने बताया कि किस प्रकार समाज सेवा की ओर रुझान के चलते उन्होंने इंजीनियरिंग कॉलेज की नोकरी छोड़ी ओर संघर्ष जारी रहेगा नामक पत्रिका का प्रकाशन किया जिसमें समाज के संपन्न तबके के लिए कोई जगह नही थी इस पत्रिका में सिर्फ समाज के पीड़ित वर्ग को ही जगह मिलती थी ,संसाधनों और धन की कमी के चलते  पत्रिका के संपादक से लेकर लेखक,प्रूफ रीडर ओर यहां तक कि वितरण करने का कार्य भी स्वयं ही किया।अपनी पत्रिका मैं  लोगों की कहानी लिखते लिखते वह कब स्वयं भी उनकी मदद के लिए जाने लगे उन्हें खुद भी पता नही चला ।  नोबेल पु...

धार्मिक प्रथा कहां तक सफल?

औरत तो सदियों से अपने बाल ओर चेहरा छुपाती आई है क्या मिला उसको ? क्या ओरत की इज़्ज़त करना  आ गया लोगों को इस्लाम में लगभग 1400 साल से पर्दा कर रही है औरत, तथाकथित सनातन धर्म भी सदियों ...

यही है भष्टाचार मुक्त सरकार?

हाई कोर्ट द्वारा भी अयोग्य घोषित किये जाने पर नरोत्तम मिश्रा जी अभी तक पद पर बने हुए हैं क्या मुख्यमंत्री जी उनसे इस्तीफा मांगने का साहस नही जुटा पा रहे? या फिर यह सब एक ही हम...

देश या धर्म?

उम्मीद करता हूँ आप मुझसे सहमत होंगे । हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कई समस्याएं हमारे सामने आती हैं। आमतौर पर हर समस्या के लिए हम देश को ही जिम्मेदार ठहराते हैं  जैसे नोकरी न मिलना,सही कानून व्यवस्था का न होना ,महिलाओं पर अत्याचार होना,सैनिकों का शहीद होने  इन सब के लिए या तो हम सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हैं या देश को ओर ऐंसा करना गलत भी नही है जिस देश में हम रह रहे हैं हमारी उम्मीद होती हैं उस देश से वेसे ही जैसे एक संतान की अपने माता - पिता से । जब हम हर समस्या के लिए देश से उम्मीद रखते हैं तो क्या हमारा फ़र्ज़ नही है कि देश को सबसे ज़्यादा तवज्जो दी जाए । हम में से अधिकतम लोगों के लिए देश से ज़्यादा महत्वपूर्ण धर्म है , ऐंसे लोगों से प्रश्न है मेरा: अगर धर्म सब कुछ है तो खराब सड़क के लिए अपने धर्म को जिम्मेदार क्यों नही मानते, महिलाओं पर जब अत्याचार होता है तो क्यों अपने परमात्मा को दोष नही देते क्योंकि परमात्मा ने ही तो बलात्कारियों को बुद्धि दी है ना।  अब आप में से कुछ लोग कहेंगे या सोचेंगे कि धर्म अपनी जगह है और देश अपनी जगह  उनके लिए एक ओर प्रश्न है कुछ हिंदुओं द्...

क्या हम आज़ाद हैं?

सिंधु घांटी सभ्यता से आज यानी 2017 तक हम भारतीयों  के जीवन में एवं संस्कृति में कई तरहाँ के परिवर्तन आये है ।इसी भूमि पर सभ्यता के प्रारंभ में जब मानव जीवन यापन के लिए विभिन्न स...